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Sant Santaji Maharaj Jagnade
Sant Santaji Maharaj Jagnade संत संताजी महाराज जगनाडे
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साहू तेली समाज का इतिहास

    विद्धान अभी तक यह मानते हैं कि सिंधु सभ्यता काल जिसे पूर्व वैदिक काल भी कहा जाता है. सप्त सैंघव प्रदेश ( पुराना पंजाब, जम्मू कश्मीर एवं अफगानिस्थात का क्षेत्र) में, जो मनुष्य थे वे त्वचा रंग के आधार पर दो वर्ग में विभाजित थे । श्वेत रंग वाले जो घाटी के विजेता थे आर्य और काले रंग वाले जो पराजित हुये थे दास कहलाये । विद्वान आर्य का अर्थ श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि वे युद्ध के विजेता थे । ये मूलत: पशु पालक ही थे । कालांतर में इन दोनों वर्गो में रक्त सम्मिश्रण भी हुआ और वृहत्तर समाज वर्णे मे बंटते गया, जा संघर्ष की जीविविषा है ।  जिन्होंने पराजय स्वीकार कर लिशे और विजेता जाति की रिति-निती अपना लिये वे आर्यो के चतुर्वर्णीय व्यवस्था में शामिल हो गये । जिस पराजित समूह ने आर्यें की व्यवस्था स्वीकार नीं किये वे दास, दस्यु, दैत्य, असुर, निषाद इत्यादि कहलाये । तब तक जाति नहीं बनी थी और वर्ण स्थिर नहीं   था । 

    महाभारत में तुलाधर नामक तत्वादर्शी का उल्लेख लिता है जो तेल व्यवसायी थे किन्तु इन्हें तेली न कहकर वैशस कहा गया, अर्थात तब तक (ईसा पूर्व 3 री - 4 थी सदी) तेली जाति नहीं बनी थी । वाल्मिकी के रमकथा में भी तेली जाति का कोई उल्लेख नहीं है तथा अन्य वैदिक साहित्यों में भी तेल पेरने वाली तेली जाति का प्रय्तक्ष प्रसंग हीं मिलता है । पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में विष्णु गुप्त नाम तेल व्यपारी की विद्धता का उल्लेख है ।

    आर्य सभ्यता के चतुर्वर्णीय व्यवस्था में ब्राम्हण, और क्षत्रिय के बीच श्रेष्ठता के लिये स्पर्धा थी । वैश्य के उपर कृषि, पशुपालन एवं व्यपार अर्थात उत्पाद का वितरण का दायित्व था, इन पर यज्ञ एवं दान की अनिवार्यता भी दी गई । जिससे समाज मैं अशांति थी। तब भगवान महावीर आर्य, जो क्षत्रिय थे, जिन्होंने यज्ञों में होने वाले असंख्य पशुयों की हत्या का विरोध किया, साथ ही जबरदस्ती दान की व्यवस्था का विरोध कर अपरिगृह ि सिद्धांत प्रतिपादित किया । इसके बाद शक्य मुनि गौतम बुद्ध हुये, जिन्होंने भगवान महावीरके सिद्धांतो को आगे बढाते हुए, वर्णगत/जातिगत/लिंगगत भेदभाव का विरोध किया । गौतम बुद्ध भी क्षत्रिय थे और उन्हे, क्षकत्रय, वैश्य एवं शुद्र वर्ण का सहज समर्थन मिला । इसी दौरान सिंधु क्षेत्र में  ग्रिक आक्रमण हुआ और अतं में चंद्रगुप्त मौर्य मगध के शासक बने। इनके वंशज आशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया , जिसमें एक लाख मनुष्य मारे गये तथा डेढ लाख मनुष्य घायल हुए । युद्ध के विभत्स दृश्य को देखकर सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हुआ और वे बुद्ध धर्म के अनुयायी हो गये थे ।  महावीर एवं गौतम बुध के कारण प्रचलित चतुर्वर्णीय व्यवस्था की श्रेणी बद्धता में परिवर्तन हुआ । नवीन व्यवस्था में ब्राह्मण के स्थान पर क्षत्रिय श्रैष्ठतम हो गये और ब्राम्हण, वैश्य एवं शुद्र समान स्थरपर  आ गये । फलस्वरूप वर्ण मे परिवर्तन तीव्र हो गया । ईसा के 175 वर्ष पूर्व मग के अंतिम सम्राट  मौर्य राजा  वृहदरथ को मारकर, उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुंग राजा बने  जो ब्राह्मण थै । माना जाता है  पुष्पमित्र शुंग के काल में ही किसी पंउीत ने मनुस्मृति की रचना की थी । शुंग वंश का 150 वर्षै में ही पतन हो जाने से मनुस्मृति का प्रभाव मगध तक ही रहा । 

    ईसा के प्रथम सदी के प्राप्त शिला लेखों में तेलियों के श्रेणियों / संघों (गिल्ड्स) का उल्लेख मिलता है । ईसा पश्चात महान गुप्त वंश का उदय हुआ। जिसने लगभग 500 वर्ष तक संपुर्ण भारत को अधिपत्य में रखा । इतिहास कारों ने गुप्त वंश को वैश्य वर्ण का माना है । राजा समुद्रगुप्त एवं हर्षवर्धन के काल को साहित्य एवं कला के विकास के लिए स्वर्णिम युग कहा जाता है , गुप्त काल में पुराणों एवं स्मृतियों रचना हुई । गुप्त वंश के राजा बालादित्य गुप्त के काल में नालंदस विश्वविद्यालय के प्रवेश वार पर भव्य स्तूप का निर्माण हुआ, चीनी यात्री व्हेनसांग ने स्तूप के निर्माता बालादित्य को तेलाधक वंश का बताया है । तिहासकार ओमेली एवं जेम्स ने गुप्त वंश को तेली होने का संकेत किया है । इसी के आधार पर उत्तर भारत का तेली समाज गुप्त वंश मानते हुये अपने ध्ज में गुप्तों के राज चिन्ह गरूढ को स्थापित कर लिया  । गुप्त काल में सनातन, बौद्ध एवं जैन धर्मालोंबियो समान दर्जा प्राप्त था । इसी काल में 05 वी सदी में अहिंसा पर अधिक जोर देते हुए, हल चलान तथा तेल पेरने को हिंसक कार्यवाही माना जाने लगा, जिससे वैश्य वर्ण में विभाजन प्रारंभ हुवा । हल चलाकर तिलहन उत्पन्न करने वाले तेली जाति को स्मृतिकारों ने शुद्र वर्ण कहा । इतना ही नहीं, तिलहन के दाने में जीव होने तथा तेल पेरने कोभी हिंसक कार्यवाही कहा गया । गुजरात - महाराष्ट्र-राजस्थान का क्षेत्र जहां सर्वाधिक तेल उत्पादन होता था, घांची के नामसे जाना जाता था । जैन मुनियों के चतुर्मास काल में घानी उद्योग को बंद रखने का दबाव बनाय गया फलस्वरूप तेलियों एवं शासकों के मध्य संघर्ष हुआ । जिन तेलियों ने घानी उद्योग को बचाने शस्त्र उछाया वे घांची क्षत्रिय कहलाये गये । जिन्होंने केवल तेल व्यवसाय किया वे तेली वैश्य, तथा जिन्होंने सुगंधित तल का व्यापार किया वे मोढ बनिया कहलाये । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पूर्वज मोढ बनिया थे । जिन्होंने हल चलाकर तिलहन उत्पादन किया ।  तेली जाती की उत्पत्ति का वर्णन विष्णुधर्म सूत्र, वैखानस स्मार्तसूत्र, शंख एवं सुमंतू मै है । 

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