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Sant Santaji Maharaj Jagnade
Sant Santaji Maharaj Jagnade संत संताजी महाराज जगनाडे
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माता राजिम की कथा

rajim mata

तैलिक कुल गौरव "माता राजिम " की कथा   भगवान राजिम लोचन मंदिर परिसर के सामने ही राजिम भक्तिन तेलिन मन्दिर है जिसके बारे में एक अनोखी कहानी प्रचलित है।  (रायपुर से 45 किमी दूर यह राजिम संगम स्थित है।)

   ऐसा कहा जाता है कि इस जगह का नाम राजिम तेलिन के नाम पर ही रखा गया है। पहले इस जगह का नाम पदमावती पुरी था। महानदी, सोंढुर और पैरी इन नदियों के कारण यह जगह उपजाऊ थी, तिलहनों के लिए खासकर यह जगह बहुत ही अच्छी जमीन है। तैलिक वंश के लोग तिलहन की खेती करके तेल निकालते थे। इन्हीं तैलिकों में एक धर्मदासभी था, जिनकी पत्नी का नाम शांति था, दोनों विष्णु के बड़े भक्त थे। उनकी बेटी थी राजिम जिसके साथ अमरदास नाम के व्यक्ति की शादी हुई। राजिम तेलिन विष्णु की भक्तिन थी। राजीव लोचन के मुर्ति विहीन मंदिर में जाकर पूजा करती थी। उस मूर्ति विहीन मन्दिर के बारे में जो कहानी उसवक्त प्रचलित थी वह इस प्रकार थी -

           सतयुग में राजा रत्नाकर नाम का एक राजा था, जो यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे, परन्तु राक्षसों द्वारा यज्ञ में विध्न उत्पन्न करने के कारण यज्ञ पूर्ण नहीं हो पाया। राजा रत्नाकर ने विष्णु के अवतार राजीव लोचन का स्मरण किया और कठोर तपस्या करने लगे। विष्णु तक राजा का आन्र्तनाद पहुंचा, लक्ष्मी को भी सुनाई दिया। लक्ष्मी ने अनुरोध किया कि विष्णु रत्नाकर कीे मदद करने उसी वक्त वहां पहुंचें।विष्णु वहां पहुंचे और यज्ञ पूर्ण कराया, उसके बाद उन्होंने राजा से वर मांगने को कहा।राजा रत्नाकर भाव विभोरहो गय। भाव विभोर होकर राजा ने कहा - "आपके जिस स्वरुपका मैं अभी दर्शन कर रहा हूँ, उसी स्वरुप का मैं रोज सपरिवार दर्शन करता रहूँ।" विष्णु जी ने ये सुनकर बैकुन्ठ में जाकर विश्वकर्मा को बुलाया और उनसे कहा कि "मैं एक कमल का फूल धरती पर छोड़ रहा हूँ - उस कमल के ऊपर ही मेरे नाम के एक मन्दिर का निर्माण करो",इस प्रकार विश्वकर्माजी द्वारा रातों-रात एक भव्य मन्दिर का निर्माण कराया। राजा रत्नाकर सपरिवार मन्दिर में राजीव लोचन के दर्शन करते थे, और पूजा करते थे।

         इसके बाद बहुत साल बीत गये। बहुत काल बीत गया। एक बार राजीव लोचन की मूर्ति की प्रशंसा सुनकर कांकेर के कंडरा राजा दर्शन के लिये आये। उस वक्त यह जगह जंगल में परिवर्तित हो गई थी। कांकेर का राजा राजीव लोचन के दर्शन कर सोचने लगे कि "ऐसे दिव्य विशाल मूर्ति को इस जंगल से निकालकर अपने राज्य में प्रतिष्ठित करुँ" - जब राजा ने पुजारियों से अपने मन की बात कही, तो पुजारी तैयार नहीं हुए।धन का लालच दिया पुजारी तैयार नहीं हुए। तब कांकेर के राजा ने जबरदस्ती मूर्ति को उठवाकर एक नाव में रखवाया और दूसरी नाव में स्वयं बैठ महानदी के जल मार्ग से अपने राज्य कांकेर की ओर जाने लगे। मार्ग में भारी तूफान आया। और इस तूफान के कारण कांकेर नरेश अपनी नाव के साथ रुद्री धाट के पास महानदी के जल में डूब गया।इधर राजिम तेलिन जो मन्दिर में जाकर पूजा करती थी, मूर्ति विहीन मन्दिर में जाकर, जब वह एक दिन नहाने गई, तो उसे एक शिला दिखाई दिया। अपने हाथ से रेत हटाकर जब उसने देखा कि शिला बहुत बड़ी तथा गोल और चिकनी है, उसने सोचा कि यह तो धानी (तेल निकालने का यन्त्र) के ऊपर रखने लायक है। और उसके बाद उसशिला को घर ले आई और ऊखल पर रख दिया। ऊखल लकड़ी काबना होता है। और इस ऊखल के भारीपन और रगड़ से तेल निकलता है। जबसे राजिम तेलिन ने उस शिला को धानी में रखा, तब से उसके व्यवसाय में उत्तोरोत्तर वृद्धि होने लगी।उस वक्त दुर्ग में जगपाल नाम के विष्णु पूजक राजा राज्य करते थे। उनका नित्य का नियम था कि दुर्ग से प्रतिदिन घोड़े पर बैठकर त्रिवेणी संगम में स्नान कर राजिम में भगवान के मूर्ति विहीन मन्दिर का दर्शन कर और शंकरजी का दर्शन कर अपने राज्य को वापस चले जाते थे।एक दिन रात में राजीव लोचन ने स्वप्न दिया कि वे राजिम तेलिन के घर जाएँ और वहाँ धानी के ऊपर जो शिला रखी है, उसे मन्दिर में ले आयें क्योंकि उसी शिला में वे विद्यमान हैं। उसके बाद राजीव लोचन ने कहा""राजिम तेलिन से बलपूर्वक लेकर उसको दुखी नहीं करना क्योंकिराजिम तेलिन मेरी अन्यन्य भक्त है।''राजा जगपाल राजिम तेलिनके घर में जाकर धानी पर रखी शिला को देखकर भाव विभोर हो गये। राजिम तेलिन एक बार राजा की ओरदेखा और एक बार शिला की ओर। राजा जगपाल ने तेलिन से उस शिला की मांग की। तेलिन ने साफ इन्कार कर दिया। उस शिला की प्राप्ति के बाद उसकी दशा सुधर गई थी। राजा जगपाल ने उसे स्वर्ण राशि का प्रलोभनदिखाया कि शिला के तौल के बराबर वे स्वर्ण राशि ले ले और शिला उन्हें दे दे। और फिर राजीव लोचन की मूर्ति के शिला को तराजू के पलड़े में रखा गया और दूसरी ओर सोना रखा गया। राजिम तेलिन ने सोचा कि राजीव लोचन अगर यही चाहते है तो फिर यही होगा। किन्तु वह तराजू का पलड़ा इंच भर भी नहीं उठा। राजा जगपाल जितनी भी स्वर्ण रखते गये। पर तराजू नहीं उठा उस रात को राजा जगपाल को फिर सेस्वप्न में राजीव लोचन दिखाई दिये और सुनाई दीया कि - "तुझे अपने धन का बहुत अंह है, इसीलियेमैंने तुझे सबक सिखाया, खैर तेरे सुकर्मो से मैं खुश हूँ। इसी लिये ध्यान से सून अब तुझे क्या करना पड़ेगा तू जिस पलड़े पर स्वर्ण रखता है,उस पर सवा पत्र तुलसी भीरख देना।" राजा जगपाल भूखे प्यासे सो गये थे। अब उनके मन में खुशी हुई। अगले दिन स्वर्ण के साथ पलड़े में सवा पत्ता तुलसी रख शिला के बराबर स्वर्ण राजिम तेलिन को देकर मन्दिर में शिला को प्रतिष्ठितकराया। राजिम तेलिन राजीव भक्तिन माता के नाम से जानने लगी। एक दिन भक्तिन माता राजीव लोचन के मंदिर द्वार पर जाकर बैठ गई। वह ध्यान समाधि में बदल गया और उन्हें मोक्ष मिला। इस क्षेत्र के भक्तजन बसंतपंचमी को राजीव भक्तिन माता महोत्सव मनाते हैं।राजीव लोचन मन्दिर के दूसरे परिसर पर राजिम तेलिन का मन्दिर है। इस मन्दिर के गर्भगृह में एक शिलाप ऊँची वेदी पृष्ठभूमि से लगा हुआ है - इसके सामने ऊपरी भाग पर सूरज, चाँद एवं सितारे के साथ साथ एक हाथ ऊपर उठाकर प्रतिज्ञा की मुद्रा में खुदा है जिसका अर्थ यह है कि जब तक धरती पर सूरज, चाँद एवं सितारे आलोक बिखेरते रहेंगे। राजिम तेलिन की निष्ठा भक्ति और सतीत्व की गवाही देते रहेंगे। राजिम तेलिन की धानी भी एक जगह स्थापित है। शिल्लापट्ट के मध्य जुते बैलयुक्त कोल्हू का शिल्पांकन है। इसी मंदिर में राजिम तेलिन सती बनी थी। उस मन्दिर की दीवारों में धुंए के निशान मन को दुखी कर देती हैं।कालांतर में उस जगह का नाम राजिम तेलिन के नाम पर ही रखा गया।

राजिम - एक संगम स्थल :
राजिम को इलाहाबाद जैसा एक संगम स्थल माना गया है। यहाँ पर8-9वीं शताब्दी के प्राचीन मंदिरों से लेकर वर्तमान में कई जातियोंएवं सम्प्रदायों के देवालय निर्मित हो गये।लोग राजिम को छत्तीसगढ़का प्रयाग मानते हैं, यहाँ पैरी नदी, सोंढुर नदी और महानदी का संगम है। इसीलिये इस संगम में अस्थि विसर्जन तथा संगम किनारे पिंडदान, श्राद्ध एवं तपंण किया जाता है। वर्तमान समय राजिम में रोज़ लगभग पचास पिण्डदान का कार्य हो रहा है।
साभार- छत्तीसगढ़ साहू समाज

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